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स्वामी विवेकानंद के 128वें उद्बोधन दिवस पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आयोजित की वर्चुअल संगोष्ठी..



एक्सप्रेस न्यूज़, बक्सर: स्वामी विवेकानंद के द्वारा 11 सितंबर 1893 को शिकागो (अमेरिका) में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में दिए गए भाषण के 128वें वर्ष की शुक्रवार से शुरुआत हो रही है. इस अवसर पर विश्व को चमत्कृत करने और भारत को जगाने वाले इस भाषण के साथ स्वामीजी के अलौकिक व्यक्तित्व, शिकागो में ऐतिहासिक भाषण को याद हुए एक वर्चुअल संगोष्ठी का आयोजन किया गया. 

स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक उद्बोधन दिवस के शुभ अवसर पर बक्सर के महाविद्यालयीन छात्र कार्य  विभाग ने एक वर्चुवल संगोष्ठी का आयोजन किया. जिस  कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में संघ के सह प्रांत कार्यवाह राजेन्द्र प्रसाद ने स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद ने आज के ही दिन धर्म संसद में भारत की गौरव गाथा व अनूठी संत परम्परा का व्याख्यान से पूरे अमेरिका में भारतीय सभ्यता का उद्बोधन किया. स्वामी विवेकानंद का वहांं जो सम्मान हुआ वो अविस्मरणीय है. सम्मेलन से पूर्व ये भगवाधारी क्या बोलेगा ऐसा बोलते हुए लोग हसी उड़ा रहे थे. लेकिन, जब स्वामी विवेकानंद ने अपना उद्बोधन शुरू किया तो वहां मौजूद सभी लोग भाव विभोर हो गए. 


उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत करते हुए कहा कि अमरीकी भाइयों और बहनों, आपने जिस स्नेह के साथ मेरा स्वागत किया है उससे मेरा दिल भर आया है. मैं दुनिया की सबसे पुरानी संत परंपरा और सभी धर्मों की जननी की तरफ़ से धन्यवाद देता हूं. सभी जातियों और संप्रदायों के लाखों-करोड़ों हिंदुओं की तरफ़ से आपका आभार व्यक्त करता हूं. मैं इस मंच पर बोलने वाले कुछ वक्ताओं का भी धन्यवाद करना चाहता हूं जिन्होंने यह ज़ाहिर किया कि दुनिया में सहिष्णुता का विचार पूरब के देशों से फैला है. मुझे गर्व है कि मैं उस धर्म से हूं जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया है. हम सिर्फ़ सार्वभौमिक सहिष्णुता पर ही विश्वास नहीं करते बल्कि, हम सभी धर्मों को सच के रूप में स्वीकार करते हैं. मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी. मुझे गर्व है कि हमने अपने दिल में इसराइल की वो पवित्र यादें संजो रखी हैं जिनमें उनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तहस-नहस कर दिया था और फिर उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली.



मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं जिसने पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और लगातार अब भी उनकी मदद कर रहा है.मैं इस मौके पर वह श्लोक सुनाना चाहता हूं जो मैंने बचपन से याद किया और जिसे रोज़ करोड़ों लोग दोहराते हैं. ''जिस तरह अलग-अलग जगहों से निकली नदियां, अलग-अलग रास्तों से होकर आखिरकार समुद्र में मिल जाती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा से अलग-अलग रास्ते चुनता है. ये रास्ते देखने में भले ही अलग-अलग लगते हैं, लेकिन ये सब ईश्वर तक ही जाते हैं. मौजूदा सम्मेलन जो कि आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से है, वह अपने आप में गीता में कहे गए इस उपदेश इसका प्रमाण है: ''जो भी मुझ तक आता है, चाहे कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं. लोग अलग-अलग रास्ते चुनते हैं, परेशानियां झेलते हैं, लेकिन आखिर में मुझ तक पहुंचते हैं.''

सांप्रदायिकता, कट्टरता और इसके भयानक वंशजों के धार्मिक हठ ने लंबे समय से इस खूबसूरत धरती को जकड़ रखा है. उन्होंने इस धरती को हिंसा से भर दिया है और कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हो चुकी है. न जाने कितनी सभ्याताएं तबाह हुईं और कितने देश मिटा दिए गए. यदि ये ख़ौफ़नाक राक्षस नहीं होते तो मानव समाज कहीं ज़्यादा बेहतर होता, जितना कि अभी है. लेकिन उनका वक़्त अब पूरा हो चुका है. मुझे उम्मीद है कि इस सम्मेलन का बिगुल सभी तरह की कट्टरता, हठधर्मिता और दुखों का विनाश करने वाला होगा. चाहे वह तलवार से हो या फिर कलम से.


आज की कार्यक्रम की शुरुआत के  पूर्व नगर शारीरिक प्रमुख राहुल कुमार ने " जिनके ओजस्वी वचनों से गूंज उठा था, विश्व   गगन, वहीं प्रेरणा पुंज हमारे, स्वामी पूज्य विवेकानंद " गीत गाकर कार्यक्रम में चार चांद लगा दिया. आज के कार्यक्रम का सफल संचालन आलोक देश पांडेय ने किया. संगोष्ठी में प्रांत के विद्यार्थी प्रमुख अजीत कुमार , जिला प्रचारक अंशुमान कुमार, नगर बाल कार्य प्रमुख गौरव कुमार, विशाल कुमार, बृजराज कुमार , जयशंकर कुमार , गौतम राय, विकास, अभिजीत, रजनीश, राहुल रंजन,निमेष कुमार, राजू पांडेय समेत सैकड़ों युवा कार्यकर्ता कार्यक्रम में सम्मिलित हुए.


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